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कर्पूरी ठाकुर

पुत्र का 5 प्रैक्टिकल कल समाप्त हुवा, अब 12th में है तो तमाम बार कुछ प्रश्न ऐसे रखते है जिनके जवाब पर संतुष्ट और असंतुष्ट दोनो भाव दिखाते है और असंतुष्टि के साथ उनके तमाम पूरक प्रश्न भी जन्म लेते रहते है ....किसी पढ़ाई में कमजोर छात्र को अध्यापक द्वारा बहुत तरजीह देने पर आज उनका प्रश्न था । मैने हल्के में समझाया, दो चार उदाहरण के साथ "बेटा अध्यापक भी मनुष्य है , कोई अन्य कारण होगा ... मोह माया तुममें भी है, सबमें होता है ..मुझमें में भी" इसी संदर्भ में पूरक प्रश्न "पापा कोई पूर्णतया ईमानदार है आपकी नजर में ?" बहुत है बेटा ...जैसे पापा ??? कर्पूरी ठाकुर .... बेटा अभी परसों इनको पुष्पांजलि देकर आया हूं । ये बिहार के दूसरे उप मुख्यमंत्री और दो बार मुख्यमंत्री रहे , जितना चुनाव लडे सब विजय ही किए .... जाति के नाई थे । इनके पिता लोगो का बाल काटते थे और इनके मुख्यमंत्री होने के पश्चात भी ....मृत्यु तक इन्होंने न कोई घर बनवाया और न ही कोई गाड़ी ली ....रिक्शे से चलते थे । बेटा जैसे मुझपर यकीन करने को तैयार ही न हो रहा था ....फिर जोर देकर मैने कहा अब और जान लो .... उनकी ईमा...
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सार सार को गहि रहे थोथा देय उड़ाया

 हमको परिवार और गुरु दो विधा सिखाते है किसी भी मसले को समझने के लिए एक होता है भाषा और दूसरा होता है भाव ....हमको भाषा भले न समझ आये हम भाव से अंदाजा लगा ही लेते है ।  स्लिप ऑफ टँग, हकलाना, तुतलाना श्रोता के लिए यह मायने नही रखता श्रोता सिर्फ वक्ता पर ही निर्भर नही रहता उसकी अपनी बुद्धि और विवेक भी होती है । हा यदि विधाता इससे विहीन किये है तब कौवा कान ले गया वाला मुहावरा अवश्य चरित्रार्थ होता है । हमसे मीरा के गायन में, चैतन्य के नृत्य में और कठौती की गंगा में भक्ति, तप , और आध्यत्म का दर्शन पाया है । हमारा सनातन यही बताता है सिखाता है । स्लिप ऑफ टँग में अभी जल्दी हमने सबने जनसंख्या को किलोमीटर में, 12th और इंटर, अध्यपक कम और टीचर अधिक जैसे कुछ एरर को पाया ....एक बार स्वर्गीय कल्याण जी को साईकल पर वोट की गुजारिश करते सुना और श्री केशव मौर्य जी को अपने बहराइच में मोदी जी के मंच पर उपस्थिति में "अबकी बार भाजपा साफ" जैसे एरर का दृश्य भी देखा ....हम जब उन्माद में, विरोध में इस कदर डूब जाते है कि हमारी बुद्धि 5/6 वर्ष के बच्चों जैसी हो जाती है तब हम मूल से भटक बचकानी हरकत पर आ जा...

मुख्यमंन्त्री मासूम है असम के ....हम होशियार

 यह व्यवस्था है । प्रसन्न हो जाइए और गर्व कीजिये ..."सबका साथ सबका विकास" का नारा लगाते रहिये.... "असम में पानी की बोतल 100 रुपये में"  एक तरफ विधायकों के रुकने की बेहतरीन पांच सितारा होटल में व्यवस्था और दूसरी तरफ उसी राज्य में पानी की एक बोतल 100 रुपये में ....अखबार में पढ़ा होगा आपने भी और पलट कर आगे बढ़ गए होंगे । मन परेशान रहा होगा उद्धव और एकनाथ शिंदे को लेकर ...या द्रोपती जी की हालत और उनके भाग्य पर चर्चा ....पर मित्र न तो हम/आप शिंदे है, न उद्धव , न द्रोपती है और न ही यशवंत ... हम/आप वही आम आदमी है जो 100 रुपये की पानी की बोतल खरीद रहे है, विवश है । उस राज्य में जहां ऐसी व्यवस्था है और मजे की बात ये की वहां के मुख्यमंत्री को पता ही नही की उनके राज्य में 40/45 विधायक कई दिनों से रुके है और उनकी सुरक्षा उनकी पुलिस कर रही ...तो बेचारे को 20 की बोतल 100 वाली बात हरगिज न पता होगी । मेरे असम के दोस्तो कितने गर्व से आपने नारा लगाया होगा, वोट दिया होगा और ढेर सारी उम्मीद भी की होगी । टैक्स आप देते हो, चुनाव में वोट आप देते हो, देश की अर्थव्यवस्था में ठेले खुनचे से लेक...

बाबा नीब करौरी

 बाबा नीब करौरी पल पल चरण वंदन .... कुछ नही जानता था बस कही कभी कम्बल ओढ़े बाबा का चित्र देख लेता था ....मैं तो ठहरा निरा गवार मुझे कुछ आता जाता थोड़े , जहां कही ऊंचा स्थान भी दिख जाए बचपन की डेवहार देवी, ग्राम देवता समझ सर झुक जाता है ।  मंदिर तो मेरा ही है पर आप यकीन करें कि इतना मूढ़ और गवाँर हूँ ( आज कल की तरह समझदार थोड़े हूँ ) मस्जिद, गुरुद्वारा और श्रावस्ती के जितने बौद्ध मंदिर है कही कोई जैन मंदिर या फिर कोई चर्च ...सर खुद ही झुक जाता है । कह सकते हो पथभ्रष्ट कंग्रेसी हूँ या 36 करोड़ भी कम पड़ जाते है मुझे, लालची बहुत हूँ ....बचपन मे दादी सामने मरहूम शमशाद चच्चा के यहाँ बाबा (ताजिया) के आने पर लोहबान और बताशा मुझसे ही भेजती थी । कहती थी तुम अपने माँ बाप की शादी के 10 साल बाद पैदा हुए । सरयू में डुबकी मारी और बोली एक नाती दे दो तुम्हारा ही नाम रखूंगी और ताजिया बाबा को उसी साल सिन्नी और लोबान भेजी ....10th में था दादी चली गई अन्यथा आज के  माहौल में पुछता जरूर दादी सरयू माँ ने दिया था मुझे कि हसन हुसैन से ....क्यों 1988 में इस प्रश्न का औचित्य ही नही था । प्रासंगिक तो अब ह...

सत्याग्रह/पत्थरबाजी

सत्यगृह....         मैं मुस्लिम भाईयों से कुछ गुजारिश करना चाहता हूँ .... हालांकि यह जनता हूँ कि इस मुद्दे पर बात करना स्वयं को विवादित बनाना ही होगा , क्योंकि दोनों तरफ चश्मा लगा है । आपने भी लगा रखा है और हमने भी लगा ही रखा है । या यूं कहें कि पूरे समाज ने ही लगा रखा है । समय, स्थान और जरूरतों के हिसाब से हम परिभाषा,नियमों में तब्दीली चाहते है और कर ही लेते है । इसमें कोई संदेह नही की यह मुल्क आपका नहीं है । किसने क्या किया, कैसे किया, कब किया ...अभी इसमें नही पड़ते पर हुवा जो भी जैसे भी हुवा, उनकी संतति, संताने उसमे न तो दोषी होती है और न ही उनके गुनाहों की हकदार है ।         कल हम कांग्रेसियों ने आंदोलन किया आप सबने, पुलिस प्रशासन, सरकार ने देखा ...25 स्थानों पर यह आन्दोलन हुवा ....लखनऊ और दिल्ली का तो आप सबने देखा ही होगा । क्या कोई हताहत हुवा ? क्या हमने पुलिस से कोई बर्बरता की ? क्या हमने भारतीय जनता पार्टी के किसी कार्यकर्ता से कोई अभद्रता की ? ....ऐसा कुछ न करते हुए भी हमने अपनी पार्टी का अपने नेता राहुल गांधी का इकबाल बुलंद किया । सरकार स...

आपदा में भी खुशियां....

  आपदा में खुशियों का अवसर .... इस शब्द से तो आप परिचित ही होंगे "आपदा में अवसर" ...कोई नही चूका अवसर लेने में, यहाँ तक जिसने इस शब्द का ईजाद किया वो भी नही....        ठोकनी,पान मसाला से सब्जी और जीवन उपयोगी सभी वस्तुएं महंगी हुई । किसने किया ? कम हो गयी थी क्या चीजे ? अवसर का आनंद सभी ले लिया....शमशान पर लकड़ी भी महंगी हुई और कफन का कपड़ा भी ...... एक नई चीज आयी ऑक्सीजन ....सभी जानते है फेफड़े पर यदि कोई दिक्कत आएगा तो आवश्यकता ऑक्सीजन की ही पड़ेगी । आपको पता है कॅरोना की पहली लहर आने के बाद भी पिछले वर्ष ऑक्सीजन का निर्यात 700 प्रतिशत बढ़ा दिया गया । रिफलिंग जहॉ 500 रुपये में होती थी उसे 2000 निर्धारित किया गया ....अन्य देशों की जनता की आवश्यकता को हमारे यशस्वी ने महसूस किया ...अपनी तो जी लेगी, लोग है ना तर्क देने वाले, उनकी महत्ता और अनिवार्यता बताने वाले ...एक और बात मई जून 2000 में जब अन्य देश वैक्सीन का आर्डर कर रहे थे तब हमसे थाली और ताली बजवाया जा रहा था ...खैर मैं भी कहाँ भटक गया , लिखने क्या जा रहा था और लिखने क्या लगा ....सरकार समर्थक आगे पढेंगे ही नही मेर...

साथी हाथ बढ़ाना

प्रिय अशोक को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं !           न तो मुझे नशा है और न ही मैं पेशेवर हूँ बधाईयां लिखने का ....पर अपने क्षेत्र रूपी ग्रंथ का अध्यनरत छात्र अवश्य हूँ, जो बेहतर व्यक्ति रूपी पन्ना मैं पढ़ कर आनंदित हो जाता हूँ ...उन पर कुछ कहने को विवश हो जाता हूँ ।          इस भारी जवानी में भी साधु के रूप "डॉक्टर अशोक चौहान" मुझे प्राप्त हुए । मुझे ओशो की वो पंक्ति याद है आ गयी..." हा मैं साधु चाहता हूँ पर भभूत लभेड़े केसरिया में एक याचक नही जो दूसरों पर आश्रित हो अपने भोजन के लिए, बल्कि मैं साधु चाहता हूँ व्यवसायी के रूप में, नेता के रूप में, अधिकारी कर्मचारी के रूप में, कृषक के रूप में,अध्यापक, डॉक्टर, इंजीनियर.... के रूप में , मानव के रूप में .....! हमारे यहाँ तो गणिकाएं भी साधु रूप में प्राप्त हुई और मनुष्य क्या स्वयं नारायण ने उनका स्वविकार किया ......         अशोक को मैं युथ कांग्रेस के एक सिपाही के रूप में जानता था वर्षो पहले ...फिर एक समाजवादी या यूं कहें जनाब मसूद से आसक्त एक प्रेमी के रूप में .....तमाम बा...