हमको परिवार और गुरु दो विधा सिखाते है किसी भी मसले को समझने के लिए एक होता है भाषा और दूसरा होता है भाव ....हमको भाषा भले न समझ आये हम भाव से अंदाजा लगा ही लेते है ।
स्लिप ऑफ टँग, हकलाना, तुतलाना श्रोता के लिए यह मायने नही रखता श्रोता सिर्फ वक्ता पर ही निर्भर नही रहता उसकी अपनी बुद्धि और विवेक भी होती है । हा यदि विधाता इससे विहीन किये है तब कौवा कान ले गया वाला मुहावरा अवश्य चरित्रार्थ होता है । हमसे मीरा के गायन में, चैतन्य के नृत्य में और कठौती की गंगा में भक्ति, तप , और आध्यत्म का दर्शन पाया है । हमारा सनातन यही बताता है सिखाता है । स्लिप ऑफ टँग में अभी जल्दी हमने सबने जनसंख्या को किलोमीटर में, 12th और इंटर, अध्यपक कम और टीचर अधिक जैसे कुछ एरर को पाया ....एक बार स्वर्गीय कल्याण जी को साईकल पर वोट की गुजारिश करते सुना और श्री केशव मौर्य जी को अपने बहराइच में मोदी जी के मंच पर उपस्थिति में "अबकी बार भाजपा साफ" जैसे एरर का दृश्य भी देखा ....हम जब उन्माद में, विरोध में इस कदर डूब जाते है कि हमारी बुद्धि 5/6 वर्ष के बच्चों जैसी हो जाती है तब हम मूल से भटक बचकानी हरकत पर आ जाते .....देश के मूल मुद्दे से हम भटक जाते है महगांई, बेरोजगारी, अर्थव्यवस्था, बिकते संसाधन जिन पर आप बोलने का साहस नही जुटा पाते कोई आपकी हिस्सेदारी आपके लिए निभा रहा है तब आप ....
थोथा थोथा को गहि रहे सार देय उड़ाय
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