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साथी हाथ बढ़ाना


प्रिय अशोक को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं !
          न तो मुझे नशा है और न ही मैं पेशेवर हूँ बधाईयां लिखने का ....पर अपने क्षेत्र रूपी ग्रंथ का अध्यनरत छात्र अवश्य हूँ, जो बेहतर व्यक्ति रूपी पन्ना मैं पढ़ कर आनंदित हो जाता हूँ ...उन पर कुछ कहने को विवश हो जाता हूँ ।
         इस भारी जवानी में भी साधु के रूप "डॉक्टर अशोक चौहान" मुझे प्राप्त हुए । मुझे ओशो की वो पंक्ति याद है आ गयी..." हा मैं साधु चाहता हूँ पर भभूत लभेड़े केसरिया में एक याचक नही जो दूसरों पर आश्रित हो अपने भोजन के लिए, बल्कि मैं साधु चाहता हूँ व्यवसायी के रूप में, नेता के रूप में, अधिकारी कर्मचारी के रूप में, कृषक के रूप में,अध्यापक, डॉक्टर, इंजीनियर.... के रूप में , मानव के रूप में .....! हमारे यहाँ तो गणिकाएं भी साधु रूप में प्राप्त हुई और मनुष्य क्या स्वयं नारायण ने उनका स्वविकार किया ......
        अशोक को मैं युथ कांग्रेस के एक सिपाही के रूप में जानता था वर्षो पहले ...फिर एक समाजवादी या यूं कहें जनाब मसूद से आसक्त एक प्रेमी के रूप में .....तमाम बार इलेक्ट्रान अपनी कक्षा को छोड़ निचले या उच्च कक्षा में कूद ही जाते है ऊर्जा की अधिकता या निम्नता से ...कभी कभी परमाणु
 सामंजस्य भी बिठा लेते है तो कभी कुछ लेकर या कुछ देकर आयन का रूप धारण करते है । 
         इधर पिछले साल लॉकडाऊन में साथ बैठने का मौका मिला ....साधुता, सरलता और बलरामपुर में जन्मे एक क्षत्रीय में ब्राह्मणों के सारे गुण और ब्राह्मणो से द्वेष नहीं बल्कि अपार प्रेम/सम्मान....मानव से प्रेम और मानवता के उत्थान हेतु चिंतित...बहुत से गुण दिखे । 
          शपथ पूर्वक कहता हूँ, एक बार भी नही कहा कि समाजवादी पार्टी छोड़ कांग्रेस में आ जाओ ...जाने क्या हुवा मेरे प्रदेश सचिव के सम्मान समारोह में आकर हाथ पकड़ लिए .....
साथी हाथ बढ़ाना, साथी हाथ बढ़ाना
एक अकेला थक जाएगा मिल कर बोझ उठाना
साथी हाथ बढ़ाना....

अनुज आशीष एवं अनंत शुभकामनाये ....




 

Comments

  1. Bahot behtareen likhte hain aap..too good sir.

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  2. बेहतरीन दादा।
    अशोक भाई को मेरी तरफ से भी हार्दिक शुभकामनाएं।


    माफ करना लेकिन पढ़ते समय एक चुभन हुई दादा
    "एक क्षत्रिय का ब्राम्हणों से द्वेष नही बल्कि अपार प्रेम"
    ऐसा प्रतीत हुआ कि क्षत्रिय का ब्राम्हण से द्वेष करना एक आम परम्परा हो।

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    Replies
    1. बाबू ये तो इतिहास में भी देखा गया । पर इसका विकृत रूप मेरे यहाँ मैं बचपन से देखता आ रहा हूँ । अब आहत हूँ । प्रयासरत भी हूँ खाई पाटने में और कोपभाजन का शिकार भी ....जबकि सत्य यह है कि दोनों ही एक दूसरे के पूरक है गुरु शिष्य के रूप में, मित्र की रूप में, भगवान और भक्त के रूप में ....पर लोग क्यों नही समझते ।

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