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श्रद्धांजलि

 पूर्व मंत्री एवं राज्यपाल स्वर्गीय माता प्रसाद जी को श्रद्धा सुमन...



लोग वंशवाद के मुखर विरोधी होते है । मजे की बात ये है कि जो अपने संतान के लिए दिन रात प्रयासरत रहते है । कही कही अनुचित कार्य, नकल, घूस आदि के भी हिमायती हो जाते है वो भी वंशवाद के मुखर विरोधी होते है । भला कौन पिता नही चाहता कि हमारा पुत्र हमसे अधिक न करे तो कमसकम मेरे द्वारा अर्जित धन मान सम्मान प्रेम को बरकरार रखे ......

बुढ़ापे का सहारा भी संतान ही होता है और अंतिम समय तक मान सम्मान की रक्षा भी पुत्र-पुत्री नाती, पोते करे तो गर्व होगा । कोई यह भी नही चाहता होगा कि हमारी तेरही और वर्षी भी अनमने मन से हो ...कई पीढ़ियों तक बेहतर हवन, अगियार पाने की तमन्ना तो होगी ही ( हालांकि अपने मृत्यु के बारे में तो सोचने का साहस ही नही होता होगा , क्यों ? अन्यथा पाप और गलतियां कम होने लगे )

         कल पूर्व राज्यपाल माता प्रसाद जी नही रहे । मेरी इनकी मुलाकात मेरे कार्यालय में पहली बार हुई, ये खुद आये थे । अपनी कोई पुस्तक आसाम भेजने के लिए ....पुस्तक गयी और कही गुम हो गयी । फ़ोन पर कई तगादे के बाद एक दिन अपनी शिकायत लिए आ धमके ....किताब खोने पर इनको क्रोध बिल्कुल नही था जैसे सिफ़ारिस सा मुझसे कर रहे हो । मुझे कई बार समझना पड़ता था शायद दोनों कान में मशीन लगी थी । हालांकि मैं पुस्तक खोजने में पूरे ताकत लगाए था ।       

           दूसरी मुलाकात में मुझे पता चला कि ये पूर्व मंत्री है और आसाम के पूर्व राज्यपाल ...मैं आश्चर्यचकित था , हैरान भी क्योंकि हम तो बलरामपुर से आते है हमने तो विधयकों का जलवा देखा है, विंदास । खैर संबंध हुवा । पुस्तक भी मिला  , तीसरी बार धन्यवाद भी देने आए ...उसी तरह रिक्शे से ....

      श्री नारायणदत्त तिवारी जी की मृत्यु हुई । उनका पार्थिव शरीर विधानसभा के मण्डप में रखा था । मुलायम जी और योगी जी और तमाम लोग दर्शन करके जा चुके थे । हम कांग्रेसी अंतिम समय तक साथ ही रहना चाह रहे थे । मैं व्यक्तिगत बहुत परेशान था बड़ा दुख था कि तमाम मुलाकात के बाद मैंने एक भी फोटो नही लिया तिवारी जी के साथ । तिवारी जी मेरे लिए बहुत सम्मानीय है । आपको उनका कुछ और याद होगा मुझे कुछ और .... हमारे सारे नेता बाहर बैठे कुछ प्लान कर रहे थे कि मेरी निगाह गेट पर गयी ...चार पांच पुलिस अधिकारी एक बुजुर्ग को अंदर नही आने दे रहे थे । मैं बेतहाशा भागा , अधिकारी को धक्के देता हुआ हाथ पकड़ा ....बाबू जी अंदर आइये... सारे अधिकारी टूट से पड़े मुझपर, मैं चिल्ला पड़ा होश में हो ये पूर्व ......सब दो दो कदम पीछे कुछ ने जय हिंद ठोका ...बड़े मुश्किल से सीढिया चढ़ा कर लाया तब तक श्री प्रमोद तिवारी जी की निगाह पड़ी ...उन्होंने उचित सम्मान दिया  ...

ऐसा क्यों ?

क्या सहज होना, साधारण होना अंतिम समय मे इस स्थिति में आने जैसा ....क्या संतान को इस लायक नही करना चाहिए ?  जो संतान को आगे बढ़ाए वो बेईमान,  भ्र्ष्ट....

अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि ....

परमात्मा आपको अपने श्री चरणों मे स्थान दे ...हमे भी आशीष दे दीजिए कि बुढ़ापे में ऐसे ही पुलिस वाले रोके और फिर कोई और नही मेरी संतति जलवे से मुझे अंदर ले जाये , क्योंकि मैं वंशवाद का विरोधी नही ....


चंद्रशेखर मिश्र "शेखर"

व्हाटसअप नंबर 7897868786

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