आदरणीय अनिल भैया को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाये.....
अनिल भैया के बारे में पहली बार मुझे मेरी बड़ी बुवा (राजेश्वर मिश्र की माता जी) ने बताया , तब उनके हाथ मे एक पुस्तक थी मुझे अच्छी तरह याद नही पर शायद उसका शीर्षक था "जलता हुआ मकान" जो उन्होंने बताया कि इसे अनिल गौड़ जी ने लिखा है । मेरी उम्र उस समय 17 वर्ष की रही होगी , मेरे लिए ये बात किसी आश्चर्य से कम न थी , क्योंकि मैं उस समय बलरामपुर को इस नजर से न देखता था न ही देखने की समझ थी मुझमे ....पढ़ने लिखने में अच्छा था और पिता के सानिध्य से थोड़ी दूरी मिली थी । मैं बलरामपुर पहुँच चुका था ....डिग्री कॉलेज...जिला मुख्यालय की गर्मी....डिग्री कॉलेज के आस पास का माहौल उस वख्त कुछ कुछ कश्मीर जैसा था ...कट्टा, अच्छा असलाह ....पण्डितवा...ठाकुरवा....कटोवा.... जैसे शब्दों की भरमार.... कालीथान, कॉलेज के आसपास,टेढ़ी बाजार और सराय फाटक पर तब बड़े बड़े सूरमा का उदय हो चुका था .....तुलसीपुर और बलरामपुर उस वख्त इंडिया पाकिस्तान की भूमिका में था ।
ऐसे में मैं अनिल गौड़ जी, मुंशी जी,मंसूर साहब, पयाम साहब, बेकल साहब, सरदार अली जाफरी ....अपने तुलसीपुर में आद्या जी, ओम प्रकाश जी, पवन बक्शी जी, नीरज बक्शी जी, आफरोज तालिब जी ,प्रकाश गिरी भैया...और तमाम विभूतियों के संपर्क में आने का प्रश्न ही नही उठता था .....संभवतः नारायण राजनीति में आने की भूमिका बना रहे थे और तमाम कुसंग के माध्यम से मुझे ट्रेडिंग देने लगे होंगे . ..
फूफा जी मेरे ऐसे तमाम लोगो के कद्रदान थे क्योंकि ठीक सामने मुंशी जी रहते थे ....अनिल भैया के बारे में वो पुस्तक वाली परिचय के बाद फिर परिचय हुवा फेसबुक पर ....एक विद्रोही के रूप में , सरकार को संसदीय और साहित्यिक भाषा मे कोसते हुए, यू कहे तो गरियाते हुए......
अनिल भैया से फिर प्रेम बढ़ गया , अक्सर इस विधा के मालिक सरकार को तेल लगाने वाले की हैसियत में आ जाते है इस उम्र तक ...और अधिक सम्मान और पुरस्कार पाने की भूख में ...बिरले ही अनिल भैया और रविश कुमार जैसे होते है । विद्वान की भूमिका परिवार में पिता स्वरूप होता है , बेटा आईएएस भी हो जाये तब भी उसकी गलतियों और नाकामियों पर झड़प लगाना उनकी आदत भी हो चुकी होती है और कर्तव्य भी .....
मजे की बात ये है कि आज तक मैं अनिल भैया से मिला ही नही ...
मेरी छोटी समझ और बुद्धि ने अनिल जी के पास संदेश भेजा कांग्रेस जॉइन करने के लिए , और मेरे मन मे ये विचार था कि मैं अनिल भैया को "विचार विभाग" (कांग्रेस के एक प्रकोष्ठ) जी जिम्मेदारी दिलाऊंगा । मेरा स्वार्थ था कि मेरी पार्टी में इनके माध्यम से तमाम प्रबुद्ध जन आएंगे और मैं भी उन सभी के आशीष का पात्र हो सकूंगा .....पर अनिल जी ने मेरे जिला अध्यक्ष अनुज सिंह को साफ मना कर दिया .....मैं असहज हुवा, थोड़ा दुखी भी ....
पर संस्कार, शिक्षा और पिता की कृपा ने मेरे अंतर्मन को जगाया और मैं खुद पर ही बड़बड़ाया ....
क्यों चला था रे कबीर को बांधने .......
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