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बुलबुल (भाग-2)


एक बार पुनः आपको ले चलता हूं उसी बुलबुल की ओर ......
सामान्य रूप से बुलबुल आकर अपने घोसले में बैठी रहती थी ,जो तीन अंडे उसने दिए थे उसे "सेती" रहती थी 
हमारे क्षेत्रीय भाषा मे "सेना" ही कहते है । जब पक्षी अपने अंडे पर बैठकर 
उसे गरम करती है, उसका रक्षा करती है,माँ रूपी साधना करती है। नारी के महान होने में,
इस जगत को जीवंत बनाये रखने में,  जीवन चक्र को चलाये रखने में ..
पुरुषों से आगे और पिता से भी महान होकर सिर्फ माँ, ममता मयी माँ ही नही देवी की उपाधि से विभूषित हो जाती है ....
वह प्रक्रिया। वही करती रही। कभी मुझे डर कर उड़ जाती थी तो कभी ढीठ की तरह देखती रहती थी और तब मैं डर जाता था... 
की कही चोंच से मुझ पर वार न कर दे प्रतिरक्षा में ...कही मेरी आँख ....और मैं स्वयं पीछे हो जाता था । 
ये मन कभी कभी इतना व्याकुल हो जाता था कि इसे सहला लू । प्यार कर लूं, एक माँ को अभिवादन कर लूं ...
पर वही डर की फुर्रर्रर्रर्ररर हो जाएगी। मैं बाधक हो जाऊंगा इसकी साधना में । बस मैं बगल में ... "अब तो और नजदीकी हो गयी"
मोबाइल, अखबार में व्यस्त रहकर अपने भविष्य की साधना के बारे में प्लान ही बनता रहता हूं ....
और ये महारानी अपनी साधना में लीन मुझे चिढ़ा रही होती है या ललकार रही होती है कि देखो ऐसे काम न चलेगा, जो तुमने साधा है 
लक्ष्य ना उसमे इस तरह....एक बार तुम चूक चुके हो चंन्द्रशेखर अपने सिविल की तैयारी में ....अब फिर चूकोगे क्या राजनीति में भी ?...
सीख लो मुझसे तपना, जलना, निडर होना, और इस तरह साधना में लीन होना ....तब ...तब शायद...तुमको इसी तरह करना होगा
मिटना होगा ....न तो तुम राजेश पायलट साहब के बेटे हो न ही तुम अमित शाह साहब के ...तुम तो मेरी तरह हो ....
बहुत कुछ वो कहती है । मैं सुनता हूं और लंबा सा हम्म्म्म मन में ही कहता हूं ....
हाँ तो मैं कहना चाह रहा था कि फिर कल देखा हलचल, वो घोसले में बहुत परेशान सी थी। बार बार उड़ जा रही थी । उसके चोंच में कुछ 
लगा था, रक्त सा, कुछ बहुत व्यस्त थी । अब न मैं पूछ सकता और न ही बोलने से वो रही । हमारी भाषा मे अंतर जो ठहरा । हम दोनों 
बस भाव ही समझते है एक दूसरे का । मुझे लगा ये कुछ गलत कर रही है क्या ? मैं उठा और बोला अब तुम
जाओ ...ये फुर्रर्ररर ....वाह अब तो मेरे खुशी का ठिकाना ही नही । दो अंडे गायब और दो नवनिहाल मेरे आंखों
के सामने ..विल्कुल निवस्त्र जैसे मेरे श्रेय, ओम, चिड़िया, गुड़गुड़,मान्या और किकी की तरह ...
जैसे वो इस दुनिया मे आये । मैं खुशी में झूम भी रहा था और उनका शरीर, उनकी साँसे और उनका वो रूप देख 
भी रहा था ।कल तो प्रसन्न था ही, आज प्रातः उठकर देखा तो तीसरा अंडा भी गायब और अब बच्चो की संख्य
तीन हो गयी । आओ देखे..ऊपर के चित्र को "जूम" करके देखे जूम बड़ा जरूरी आइटम है । प्यार को जो उमड़ता
है या वासना को जो बेचैन करता है ..उसे ही तृप्त करने को जूम बड़ा उपयोगी होता है । 
अक्सर लोग डीपी भी जूम करके देखते है। देखने मात्र में ही सब कुछ पा लेने की प्रक्रिया ही "जूम" कहलाती है ।
मेरे लिए यही परिभाषा है जूम की । हा तो आप जूम करके उन बच्चों को देखे। शाकाहारी के लिए ये विस्मयकारी
 है चमत्कार है, नया अनुभव एवं नया दर्शन है परंतु माँसाहारी के लिए कोई नई बात नही...उन्होंने अनगिनत बार
इस रूप को देख है चिकवा के यह बोटी में बदलने से पूर्व।
हा ऊपर मैन एक बात कही की अब तो ये और नजदीक आ गयी ...तो हुवा यू की एक दिन रात को आंधी आयी बहुत 
तेज घोसले वाले गमले के बगल वाला गमला गिरा था ...मेरी तो साँसे ही रुक गयी। पल भर में जाने क्या क्या सोच
गया ..अंडे फुट गए होंगे ....
तमाम बातों को सोचता हुवा दो दरवाजे पार आया ...लंबा सास लिया , बगल वाला गिरा 
था ...सौभाग्यशाली हु कोई तपस्या तो किया ही होगा मैन भी, जो इतनी सुग्घड़ पत्नी मिली । मैडम जी मुझसे पूर्व
ही उठ कर घोसले वाले गमले को अंदर की तरफ करवा चुकी थी सेवक से । मेरा सेवक भी मुझे बुलबुल की रिपोर्टिंग
करता रहता है ...यानी मेरे सोफे के करीब । पत्नी श्री अब सिर्फ रात में इस मौसम में आनेवाली आंधी में अपने कपड़े,
राशन और जरूरी सामान की चिंता ही लेकर नही सोती, बल्कि मेरे बुलबुल की भी उनको चिंता रहती है .....राम मिलाइन जोड़ी.... 
ह्म्म्म, तो साथियो मेरी बुलबुल माँ हो गयी । अब इंतजार है इन बच्चों के पंख आने का, उठ खड़े होने का, दाना चुगने का और फुर्रर्ररर हो जाने का .....


                                                                                                                                                                                                                                                          

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