महादेवी जी के गिल्लू ने बचपन में प्रभावित किया था लेकिन उसका आनंद मुझे अब प्राप्त हुआ ......
2 जुलाई की बात है, मैं अपने बरामदे में बैठा था । मेरे बगल में एक गमले का वृक्ष जिसकी ऊंचाई महज 4 फीट होगी । मुझे वृक्ष नहीं कहना चाहिए, दरअसल वो पौधा है । उस पौधे में एक बुलबुल का बार बार आना ....अखबार पढ़ते हुए भी मैं उस दृश्य को देखने के लिए विवश हो गया । आखिर यह चिड़िया बार-बार यहां क्यों आ रही है ? मन में कौतूहल .....तमाम बातें आने लगी..... इसे मेरा भय क्यों नहीं ?, फिर एहसास हुआ एक नहीं दो चिड़िया बारी-बारी से आ रही है और उस पौधे में कुछ कर रहे हैं । 

ओह.... घोंसला बना रही है । मेरी खुशी का ठिकाना ना रहा ....मैं पूरी इमानदारी से कहता हूं यदि मैं अपना घर बनवा रहा होता तो शायद इतनी खुशी मुझे ना मिलती जितना यह दृश्य देखकर.... मैं तकरीबन ढाई घंटे बैठा रहा । बहाना अखबार का था, पर देख रहा था उनकी हरकतों को, उनके लगन को, उनके मेहनत को, उस जोड़े के एक दूसरे के प्रति समर्पण को, और गर्व सा महसूस हो रहा था.... कि देखो मुझसे 2 फुट दूर रखें इस पौधे पर यह आ रहे हैं,
निश्चिंत है और इनको मुझसे कोई भय नही । मैं परमात्मा को धन्यवाद दे रहा था और आनंद की अनुभूति कर रहा था .......
कार्यालय चला गया पत्नी से फोन पर पूछा ....पत्नी ने बताया घोंसला बन गया है ....अगले दिन फिर बैठा मैं एक चिड़िया उसमें बैठकर रोटेट कर रही थी । नाच रही थी, फिर मैं सोचने लगा यह क्यों नाच रही है ? फ़सी है क्या ?जैसे कोई समस्या है ....जब उड़ कर गई तो उस घोसले की खूबसूरती मैंने देखी । वह समस्या में नही थी, वह घूम घूम कर घोसले को बुन रही थी । अब मैंने उसे माहौल देना आरम्भ कर दिया .... उस गमले के अगल-बगल तीन और गमले रखा , प्रतिदिन मैं जल और अनाज रखता हूं चिड़ियों के लिए..... उसका स्थान बदल कर उस पौधे के सामने रखा... ताकि इसके भोजन और पानी का इंतजाम हो सके । कल दोपहर में पत्नी ने सूचना दिया फोन पर कि "आप दादा जी बन गए" मैंने कहा मतलब ? उन्होंने कहा आपके बुलबुल के घोसले में दो अंडे रखें है ।
मित्रों वास्तव में पिछले चार-पांच दिनों से प्राकृतिक जीवन का आनंद ले रहा हूँ । मेरे बरामदे में मेरे सेवक का बार बार आना, कुछ काम करना, मेरे सारथी और सेवक का वही नहाना, आना जाना, बर्तन साफ होना, मेरा अखबार पढ़ना, मेरे बच्चों का झूला झूलना....... और इन सबसे बेखबर मेरी यह दो बुलबुल परिवार की सदस्य सी हो गई ।
मैं इसे नारायण की कृपा समझता हूं कि किसी का बसेरा मेरे घर में हुआ । मैं इसे अपने आनंद के स्रोत के रूप में लेता हूं और वास्तव में बहुत अच्छा महसूस कर रहा हूं ।
मैं सोच रहा था इसे कैसे पता कि ये गर्भ से है ? किस डॉक्टर ने इसे डेट बताया कि फल दिन डिलीवरी होगी?, घोसले के बारे में किसने राय दिया ? गर्भ से होने पर भी इतना मेहनत...उसके सहयोगी का उसे बराबर सहयोग करना....फिर घोसला बनाने के अगले दिन हो प्रसव पीड़ा से उऋण होना .....
कितना दर्शन है । कितना सीख है ....हम इनको जानवर कहते है । स्वयं पर गर्व करते है कि हमारे पास बुद्धि के साथ-साथ विवेक भी है , जानवरो के पास सिर्फ बुद्धि .....पर नही ये जानवर इनकी समझ सम्भवतः हमसे बहुत आगे है । हम सीख सकते है .......
अब इंतजार है इस अंडे से बच्चों का निकलना और फिर उनका उड़ जाना ......तकलीफ अवश्य होगी परंतु तकलीफ में भी आनंद की अनुभूति होगी । आप भी प्रकृति के संपर्क में रहिए ।
मेरे घर के अगल-बगल बड़े बड़े वृक्ष हैं फिर भी यह बुलबुल मेरे गमले में अपना घोंसला बनाती है । नारायण ऐसे ही कृपा बनी रहे लोगों का विश्वास जीतता रहू.....
थैंक्यू बुलबुल